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पर्यावरण दिवस—कोविड-19 लॉक डाउन: पर्यावरण व भविष्य में सतत् विकास के संकेत

पर्यावरण दिवस—कोविड-19 लॉक डाउन: पर्यावरण व भविष्य में सतत् विकास के संकेत
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घटा कार्बन उत्सर्जन, नदियों को पानी हुआ साफ, वायु भी हुई स्वच्छ

सोलन (दैनिक हाक): प्रकृति स्वयं अपनी चिकित्सक है और यह बात पिछले करीब एक साल से देखने को मिली है। कोविड-19 महामारी से जहांं एक ओर पूरी मानव सभ्यता को कई मायनों में इकझोर कर रख दिया है। अनेकों तरह से भारी नुकसान पहुंचाया है, वहीं दूसरी ओर इस विपत्ति के चलते वैश्विक लॉक डाउन से पर्यावरण ने स्वयं में अद्भुत सुधार किया है। यह महामारी मानव, प्रकृति और विकास के अंतरसंबंधों में असंतुलन का साक्षात दुष्परिणाम बनकर उभरी है। विश्वभर में एक लॉकडाउन होने से सभी कारखाने, औद्योगिक इकाइयों, वाहन, हवाईजाहज, रेलगाडिय़ों, समुद्री जाहज, निर्माण व खनन कार्य बंद हुए। पर्यटकों की आवाजाही रूकी, बिजली ऊर्जा व ईंधन की मांग में कमी आई और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के दमन में भारी गिरावट हुई और मानो प्रकृति ने चैन की सांस ली। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदें के अनुसार भी इन सब साकारात्मक बदलावों के चलते ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन में कमी आएगी। महामारी के फैलाव को रोकने के अलावा लॉकडाउन का पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। इस दौरान कुछ ऐसे सबक सीखने को मिले, जिन्हें हमें अनदेखा नहीं करना चाहिए।

इसी विषय पर डॉ यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी नौणी सोलन के पर्यावरण विभाग के एचओडी डॉ सतीश भारद्वाज और डॉ शालिनी चौहान ने एक शोधपत्र भी तैयार किया है। इससे पता चलता है कि प्रकृति स्वयं अपनी चिकित्सक कैसे हैं।

प्रदूषण स्तर में आई गिरावट...

डॉ सतीश भारद्वाज और डॉ शालिनी चौहान ने शोधपत्र में बताया कि कोविड-१९ लॉकडाउन से प्रदूषण घटा है। अधिकतर वाहनों की आवाजाही पर रोक लगने व बंद पड़ी औद्योगिक इकाइयों के कारण दूषित गैसों और पीएम उत्सर्जन न्यूनतम स्तर पर आ गया है। नासा के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आई है। मार्च-२०२० से दैनिक कार्बन उत्सर्जन में १७ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। हवाई यात्राओं की दर भी लॉक डाउन के चलते ५० से ७० फीसदी तक घटी। इससे वायु गुणवत्ता सूचकांक में भी सुधार देखने को मिला। नासा की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर भारत में वायु प्रदूषण बीस सालों में सबसे कम पाया गया। उपग्रहों द्वारा भी वायुमंडलीय कण और गैसीय प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी के संकेत दिए गए हैं। कुल मिलाकर दिल्ली में ही वायु प्रदूषण के स्तर में ६० फीसदी की कमी पाई गई। इससे समस्त भारत में इसका अच्छा प्रभाव पड़ा। इस सुधार के कई प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिले। दिल्ली में दृश्यता में सुधार हुआ, वहीं पंजाव के कुछ प्रांतों से धौलाधार की सफेद पहाडिय़ां जो २१३ किलोमीटर दूर हैं, दिखाई देने का दृश्य मीडिया की सुर्खियां बना।

पानी की गुणवत्ता में भी आया सुधार

लॉक डाउन का प्रभाव पानी की गुणवत्ता और जल प्रणालियों के स्वास्थ्य पर भी देखने को मिला। कारखानों और उद्योगों की में रोक के कारण रासायनिक प्रदूषकों का नदियों में बहाव बंद हुआ। मालवाहक जाहजों की आवाजाही रूकने से समुद्री जल की गुणवत्ता व प्रदूषण में भी कमी आई। लॉक डाउन के बीच नदियों में बीओडी में भारी गिरावट आई आई और धूलित ऑक्सीजन (डीओ) की मात्रा बढ़ी। यमुना के प्रदूषण स्तर में ३३ फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई। यूपी प्रदूषण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि वाराणसी में गंगा ने डीओ की माग ८.३-८.९ ग्राम प्रति लीटर पाई गई, जोकि अच्छा संकेत है। प्रत्यक्षत्र् रूप में लॉक डाउन अवधि में गंगा, यमुना व अन्य नदियों के साफ व निर्मल जल के परिदृश्य सोशल मीडिया पर खूब देखे गए।

लॉक डाउन के नकारात्मक पहलू....

जहां लॉक डाउन के चलते पर्यावरण में सकारात्मक बदलाव हुए, वहीं कुछ प्रतिकूल परिस्थितियां भी समाने आई है। कोविड के दौरान स्वास्थ्य प्रणाली बड़े स्तर पर काम कर रही है, जिससे चिकित्सीय और स्वास्थ्य देखभाल संबंधी कचरे (मास्क, दस्ताने, सेनेटाइजर बोतले आदि) की मात्रा काफी बढ़ गई। कोविड के डर से विश्वभर में पैक किए गए उत्पादों के इस्तेमाल में ११० फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। आयात-निर्यात रूकने से स्थानीय कार्बनिक अपशिष्ट एकत्र हुआ। इसका कचरा प्रबंधन पर नकारात्मक असर हो सकता है। हालांकि नाकारात्मक सूचक पर्यावरण में हुए अद्भुत सुधार के आगे बौने साबित हुए हैं।

पर्यावरण की कीमत पर न हो विकास...

लॉक डाउन के दौरान बेहतर हवा की गुणवत्ता, स्वस्थ नदियां व जंगलों की सुधरती परिस्थिति हमें सुखद अनुभव देती है, लेकिन यह बदलाव अल्पकालीन न हो, इसका समस्त मानव जाति को ध्यान रखना होगा। यह बदलता परिदृश्य हमें जागृत करता है कि प्रगति के मापदंडों को प्रकृति को मध्यनजर रखकर बनाया जाए तो हम इस साफ पर्यावरण को संरक्षित कर सकते हैं। बड़े स्तर पर बदलाव को बदलने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर जीवाश्म ईंधन व ऊर्जा पर निर्भरता को कम करने के साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। अगर कोविड-१९ से पर्यावरण संदर्भ में आने वाले समय के लिए सीख ली गई तो अनेकों प्रकार के पर्यावरण संकटों से बचा जा सकता है। वैश्विक स्तर पर प्रदूषण में आई गिरावट से यह साफ हो गया है कि सही व्यवस्था से प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है। महामारी पर नियंत्रण पाने के बाद संपूर्ण विश्व पर ये जिम्मेदारी है कि आर्थिक, स्वास्थ्य, शिक्षा व अन्य सभी व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए ऐसे कदम उठाए जाए तो पर्यावरण व प्रकृति को क्षति पहुंचाए बिना हमें सतत विकास की ओर अग्रसर होने में सहायक हों।

Updated : 5 Jun 2021 8:07 AM GMT
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