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बढ़ता प्रदूषण हर किसी को स्मोकर बना रहा है

बढ़ता प्रदूषण हर किसी को स्मोकर बना रहा है
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मानव जीवन के लिए दहशत का पर्याय बने कोरोना वायरस के खतरे से निपटने के लिए पूरी दुनियां इस समय एक जुट हो कर उपाय खोज रही है।लेकिन वही दुनियां और देशों की राजनीतिक सत्ता अब तक प्रकृति के मिजाज़ को समझ नही पायी है।लाकडाउन को खत्म हुए अभी बहुत दिन नही हुए हैं,लेकिन जिस तरह से प्रकृति ने अपना मिजाज़ बदला है वह खुद को सभ्य समझने वाले इंसान के लिए कई सवाल खड़े करता है।उस समय डर के अनचाहे माहौल के बीच हुयी निर्मल नदियों और पवित्र हुई हवा के झोंकों ने ये साफ संदेश दिया था कि आधुनिकता की होड़ में तरक्की के पायदान पर चढ़ने वाले इंसान ने अपना और अपनी भावी पीढ़ी का कितना नुकसान किया है।हमने ज़मीन और आसमान की दूरी को तो सिमटा दिया है लेकिन साथ में प्रकृति से खिलवाड़ कर अपने विनाश की इबारत भी लिख दी है।गौरतलब है कि लाकडाउन में बिना पैसा खर्च किए नदियों की जो स्वच्छता रपट आयी थीं वह तीन दशकों में हजारों करोड़ रूपय खर्च कर भी हमारी राजनीतिक सत्ता हासिल नही कर सकी थी।तब ये माना गया था कि अब शायद जल्दी आबोहवा जहरीली न होगी लेकिन जैसे ही बंदिशें हटीं और मौसम ने करवट बदली निर्मल हवा दमघोटू हो गयी।देश की राजधानी दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई शहरें में एक बार फिर वायु प्रदूषण ने दस्तक दी है।धुंध की चादर से दिल्ली मे वायु प्रदूषण की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि हेल्थ इमरजेंसी जैसे हालात बन गए हैं।दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स खतरे के निशान से ऊपर जा रहा है।दिल्ली और आसपास के लोगों के लिए नीला आसमान देखना मुश्किल हो गया है।दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से जहां वहां के लोगों की उम्र 10 साल कम हो गइै है,वहीं समूचे उत्तर भारत में उम्र औसतन 7 साल कम हुई है।यह दावा शिकागो यूनिवर्सिटी की शोध संस्था एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो ने अपने एक विश्लेषण के जरिए किया है।मौजूदा हालात में एक और चौकाने वाला आंकड़ा है कि देश मे पिछले 18 सालों में वायु प्रदूषण में 72 फीसदी का इजाफा हुआ है।हालात और ये आंकड़ें आपस मे मेल खातें हैं।गंगा के मैदानी इलाकों यानी उत्तर भारत में देश की करीब 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है।इस सर्वे के अध्ययन के मुताबिक,विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से देखा जाए तो प्रदूषण से देश की 40 फीसदी जनसंख्या के जीवन प्रत्याशा में 7 साल की कमी का खतरा मंडरा रहा है। रिसर्च के मुताबिक, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में प्रदूषण सबसे खतरनाक स्तर पर है। इसके बुरे प्रभाव के कारण इन राज्यों के लोगों की उम्र में कटौती हो सकती है।फेफड़ों के शल्य चिकित्सकों का मत भी इससे मेल खाता है कि प्रदूषित वायु का 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हिस्सा श्वांस के साथ शरीर में जाने पर यह एक सिगरेट पीने के बराबर होता है

इसका मतलब ये हुआ कि बढ़ते प्रदूषण में हर कोई स्मोकर बन रहा है।यानी नवजात शिशु भी जब पहली सांस लेता है तो उसके अंदर प्रदूषण चला जाता है।प्रदूषण इतना ज्यादा बढ़ रहा है कि यह 24 घंटे में पीएम 2.5 के स्तर को 22 से भाग देने पर उतनी सिगरेट का धुआं लोग अपने अंदर ले रहे हैं।प्रदूषण बढ़ने से लोग बहुत ज्यादा स्तर तक बीमार हो रहे हैं।अभी तक लोगों की धारणा थी वायु प्रदूषण के कारण सिर्फ हमारे फेफड़ों और हृदय को ही नुकसान पहुंचता है।परन्तु कुछ समय पहले किये गये अध्ययनों एवं अनुसंधानों का निष्कर्ष है कि वायु प्रदूषण फेफड़ों और हृदय के अतिरिक्त हमारे मस्तिष्क को भी बुरी तरह प्रभावित करता है।ऐसा ही एक अध्ययन संयुक्त राज्य अमेरिका के येल विश्वविद्यालय तथा चीन के बेजिंग विश्वविद्यालय में कार्यरत शोधकर्ताओं ने भी किया था।इस अध्ययन से सम्बंधित एक शोध पत्र कुछ ही समय पूर्व नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस के जर्नल में प्रकाशित हुआ था।इसमें बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक प्रदूषित वायु में रहता है तो उसके संज्ञान या अनुभूति ग्रहण करने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। विशेष कर बुज़ुर्ग लोग वायु प्रदूषण से ज़्यादा प्रभावित होते हैं।बहुत से बुज़ुर्ग तो बोलने में काफी कठिनाई अनुभव करते हैं।वहीं वॉशिंगटन स्थित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट में कार्यरत वैज्ञानिकों के अनुसार जो लोग बहुत लंबे समय तक वायु प्रदूषण की चपेट में रहते हैं उनकी बोलने और गणितीय आकलन की क्षमता बहुत अधिक घट जाती है।भारत के विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र ने नवम्बर 2017 में एक अध्ययन के आघार पर निष्कर्ष निकाला था कि अपने देश में रोगों के कारण होने वाली 30 प्रतिशत असमय मौतों का मुख्य कारण वायु प्रदूषण ही है।भारत में वायु प्रदूषण की समस्या काफी चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुकी है।दरअसल यह समस्या अब सिर्फ नगरों या उद्योग प्रधान शहरों तक ही सीमित नहीं रह गई है।वरन महानगरों से बहुत पीछे माने जाने वाले नगरों में भी वायु प्रदूषण का स्तर साल में कई बार खतरे की सीमा को पार कर जाता है।वास्तव में तथ्य ये है कि उत्तर भारत खासकर दिल्ली और उसके आसपास प्रदूषण का स्तर हर साल बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंचता है।लेकिन अब तक इसका कोई ठोस हल निकलता नजर नहीं आ रहा है।

इसका असली कसूरवार कौन है ये भी अभी पुख्ता तौर नही कहा जा सकता है।जबकि प्रदूषण का स्तर हर साल बढ़ते ही मीडिया में राजनीतिक नौटंकी शुरू हो जाती है।सरकारें,राजनीतिक दल,संगठन और दूसरी संस्थाएं सभी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तो करने लगते हैं।लेकिन पर्यावरण पर हर साल आने वाले संकट का हल क्या है इस पर सभी खामोश हैं और जमीनी स्तर पर कुछ खास नही दिखता है।दिल्ली मे सत्ता और विपक्ष के नामचीन नेता,देश के आला अधिकारी और उद्दोपति भी रहतें हैं,तब दिल्ली मे कमोबेश हर साल हेल्थ इमरजेंसी जैसे हालात पैदा होतें हैं।बेशक आम आदमी के मुकाबले अमीरों के पास बचाव के ज्यादा संसाधन होतें हैं, लेकिन ये थोड़ी कड़वी सच्चाई है कि अमीर आदमी या राजनेता भी अपने लिए साफ हवा नहीं चलवा सकता।लेकिन ऐसे उन हजारों लोगों के बारे में भी तो सोच कर देखिए जिनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा सड़क पर ही गुजरता है।उनके पास हवा में भरे जहर के खिलाफ कुछ कर सकने का विकल्प और बचाव के आधुनिक संसाधन भी नही होतें हैं।दरअसल असली समस्या यह है कि हम समस्या का हल नहीं चाहते।हम चाहते हैं कि बिना कुछ करे समस्या अपने आप खत्म हो जाए। धु़ध छंटने के बाद पूरे साल कभी भी वायु प्रदूषण पर चर्चा का विषय नही होती है।दरअसल दिल्ली और देश के बाकी शहरों की आबोहवा सुधरेगी कैसे इस का कोई कारगर उपाय किसी के पास नहीं है।ये तथ्य है कि दिल्ली अचानक प्रदूषित हो गई है।दिल्ली की आबो-हवा से छेड़छाड़ की कोशिश निरंतर कई सालों से जारी है वायु प्रदूषण की सभी वजहों पर कभी एक साथ काम नही किया गया है। वाहन, उद्योगों में पेट कोक का इस्तेमाल, फर्नेस तेल और कोयला, कूड़े को जलाना, सड़कों की धूल,बेतहाशा निर्माण गतिविधियां, अनियाजित शहरीकरण, पेंड़ों की बेतहाशा कटाई जैसी वजह भी लगातार बढ़ते प्रदूषण की जिम्मेदार हैं।ऐसा नही है कि सीमित विकल्पों के कारण फसलों के अवशेष जलाने वाले हरियाणा और पंजाब के किसान एकदम बेकसूर हैं। सरकार के इस बारे में स्पष्ट आदेश हैं कि खेतों में पराली नहीं जलाई जाए,जो भी जलाएगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

फिर भी विभिन्न राज्यों मे करोड़ों टन पराली जलाई जा रही है और जलाने वालों पर मुकद्दमें भी लद रहे हैं।इस मामलें में कोर्ट का ये सवाल जायज है कि लोगों को जीने का अधिकार है, एक पराली जलाता है और दूसरे के जीने के अधिकार का उल्लंघन करता है।इस बारें में किसानों को भी सोचना चाहिए और आगे बढ़ कर सुझाये जा रहे विकल्पों पर भी गौर करना चाहिए।वहीं सेव अर्थ बाय प्लांट संस्था की तरह दूसरी संस्थाओं को भी आगे आना होगा।ये संस्था पिछले 11 सालों से हर साल किसानों और छात्रों को फलदार पेंड़ लगाने के लिए उत्साहित करती हैं।हाल में भारत सरकार ने डीजल के दाम पेट्रोल के आसपास करके डीजल वाहनों को हतोत्साहित करने की नीति बनाई है,जिसका भविष्य मे सकारात्मक असर दिखेगा ऐसी उम्मीद की जा रही है।इलेक्ट्रानिक वाहनों को बढ़ावा देने और पुराने वाहनों पर लगाम से भी कुछ असर पड़ेगा।लेकिन इसके उलट विकास के लिए जरूरी राजमार्गों और सड़कों के चौड़ीकरण के लिए पेड़ काटे जा रहें हैं।इसका कोई ठोस विकल्प नही दिख रहा है,आज जो पेड़ लगेगें वह दस साल बाद पर्यावरण बचाने में अवपनी हिस्सेदारी निभाएंगें।सवाल ये कि तब तक क्या होगा? तब तक आबादी और वाहन भी उसी रफ्तार से बढ़ेंगें तो ये प्रयास कितना कारगर होगा? इस पर कुछ कहना जरूरी नही है।आज कल जहां देखिए उततराखंड,उत्तर प्रदेश ,हिमांचल और मध्य प्रदेश में बुलडोजर और पोकलैंड गरजतें रहतें हैं।जाहिर है कि जब पहाड़ काटे जायेगें तो बरसों पुराने पेड़ भी काटे जायेगें,सो कट भी रहें हैं।एमपी में तो सोहागी घाटी तो अब समझ में ही नही आती हैं और पन्ना घाटी भी अब उतनी डरावनी नही लगती है।वैसे उत्तराखंड में अभी भी आम लोगों ने अपना पर्यावरण बचा कर रखा है।दुर्गम रास्तों से कई किलोमीटर पैदल चल कर वह अपने घरों तक पहुंचतें हैं लेकिन अपनी सुविधा के नाम पर पेड़ काटा जाना उनको मंजूर नही है।यही वजह हे कि आज भी तमाम गांवों में पहाड़ों से रिस कर आने वाला प्राकृतिक और साफ पानी उनको नसीब है।बहरहाल पृथ्वी को बचाने की जिम्मेदारी केवल और केवल सरकार की नही है,हमारी भी है।हमको और सरकार को पृथ्वी बचाने के लिए प्रकृति के साथ कदम से कदम मिला कर चलना सीखना होगा और अमल करना होगा।वर्ना हमारी आने वाली पीढ़ी हमसे यही सवाल करेगी कि हमारे लिए जीने का ये कैसा वातावरण छोड़ा है?

— दैनिक हाक फीचर्स

Updated : 2020-11-20T13:21:58+05:30
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